Tuesday, 3 April 2018

जब हवा चलती है

जब हवा चलती है….. 

बहुत  समय  पहले  की  बात  है , आइस्लैंड के उत्तरी छोर पर  एक  किसान  रहता  था . उसे  अपने  खेत  में  काम  करने  वालों  की  बड़ी  ज़रुरत  रहती  थी  लेकिन  ऐसी  खतरनाक  जगह , जहाँ  आये  दिन  आंधी  –तूफ़ान  आते  रहते हों , कोई  काम  करने  को  तैयार  नहीं  होता  था .
किसान  ने  एक  दिन  शहर  के  अखबार  में  इश्तहार  दिया  कि  उसे   खेत  में   काम  करने  वाले एक मजदूर की  ज़रुरत  है . किसान से मिलने कई  लोग  आये  लेकिन  जो भी  उस  जगह  के  बारे  में  सुनता  , वो काम  करने  से  मना   कर  देता . अंततः  एक  सामान्य  कद  का  पतला -दुबला  अधेड़  व्यक्ति  किसान  के  पास  पहुंचा .
किसान  ने  उससे  पूछा  , “ क्या  तुम  इन  परिस्थितयों  में   काम  कर  सकते  हो ?”
“ ह्म्म्म , बस जब  हवा चलती  है  तब  मैं  सोता  हूँ .” व्यक्ति  ने  उत्तर  दिया .
किसान  को  उसका  उत्तर  थोडा अजीब  लगा  लेकिन  चूँकि  उसे  कोई  और  काम  करने  वाला  नहीं  मिल  रहा  था इसलिए  उसने  व्यक्ति  को  काम  पर  रख  लिया.
 मजदूर मेहनती  निकला  ,  वह  सुबह  से  शाम  तक  खेतों  में  म्हणत  करता , किसान  भी  उससे   काफी  संतुष्ट  था .कुछ ही दिन बीते थे कि  एक   रात  अचानक  ही जोर-जोर से हवा बहने  लगी  , किसान  अपने  अनुभव  से  समझ  गया  कि  अब  तूफ़ान  आने  वाला  है . वह   तेजी  से  उठा  , हाथ  में  लालटेन  ली   और  मजदूर  के  झोपड़े  की  तरफ  दौड़ा .
“ जल्दी  उठो , देखते  नहीं  तूफ़ान  आने वाला  है , इससे  पहले  की  सबकुछ  तबाह  हो जाए कटी फसलों  को  बाँध  कर  ढक दो और बाड़े के गेट को भी रस्सियों से कास दो .” किसान  चीखा .
मजदूर बड़े आराम से पलटा  और  बोला , “ नहीं  जनाब , मैंने  आपसे  पहले  ही कहा था  कि  जब  हवा  चलती  है  तो  मैं  सोता  हूँ !!!.”
यह  सुन  किसान  का  गुस्सा  सातवें  आसमान  पर  पहुँच  गया ,  जी  में आया  कि  उस  मजदूर  को   गोली  मार  दे , पर  अभी  वो आने  वाले  तूफ़ान  से चीजों को बचाने  के  लिए  भागा  .
किसान खेत में पहुंचा और उसकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गयी , फसल  की गांठें  अच्छे  से  बंधी  हुई   थीं  और  तिरपाल  से  ढकी  भी  थी , उसके  गाय -बैल  सुरक्षित बंधे  हुए  थे  और  मुर्गियां  भी  अपने  दडबों  में  थीं … बाड़े  का  दरवाज़ा  भी  मजबूती  से  बंधा  हुआ  था . साड़ी  चीजें  बिलकुल  व्यवस्थित  थी …नुक्सान होने की कोई संभावना नहीं बची थी.किसान  अब   मजदूर की ये  बात  कि  “ जब  हवा चलती है  तब  मैं  सोता  हूँ ”…समझ  चुका  था , और  अब  वो  भी  चैन  से   सो  सकता  था .
मित्रों ,  हमारी  ज़िन्दगी  में भी कुछ ऐसे तूफ़ान आने तय हैं , ज़रुरत इस बात की है कि हम  उस  मजदूर की  तरह पहले से तैयारी कर के रखें ताकि  मुसीबत  आने  पर  हम भी चैन  से  सो सकें.  जैसे कि यदि कोई विद्यार्थी शुरू से पढ़ाई करे तो परीक्षा के समय वह आराम से रह सकता है, हर महीने बचत करने वाला व्यक्ति पैसे की ज़रुरत पड़ने पर निश्चिंत रह सकता है, इत्यादि.
तो चलिए हम भी कुछ ऐसा करें कि कह सकें – ” जब हवा चलती है तो मैं सोता हूँ.” 

Monday, 2 April 2018

जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय


। जय सियाराम ।।।। श्री रामचरीत् मानस ।।सप्तम सौपान: उत्तरकाण्ड 

चौपाई :
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी॥
जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय॥1॥
अर्थ:- प्रभु के वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीर से स्तुति करने लगे- हे भगवन्‌! आपकी जय हो। आप अंतरहित, विकाररहित, पापरहित, अनेक (सब रूपों में प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं॥1॥
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर॥
जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर॥2॥
अर्थ:- हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुण के समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुख के धाम, (अत्यंत) सुंदर और अति चतुर हैं। हे लक्ष्मीपति! आपकी जय हो। हे पृथ्वी के धारण करने वाले! आपकी जय हो। आप उपमारहित, अजन्मे, अनादि और शोभा की खान हैं॥2॥

ग्यान निधान अमान मानप्रद।
पावन सुजस पुरान बेद बद॥
तग्य कृतग्य अग्यता भंजन।
नाम अनेक अनाम निरंजन॥3॥
आप ज्ञान के भंडार, (स्वयं) मानरहित और (दूसरों को) मान देने वाले हैं। वेद और पुराण आपका पावन सुंदर यश गाते हैं। आप तत्त्व के जानने वाले, की हुई सेवा को मानने वाले और अज्ञान का नाश करने वाले हैं। हे निरंजन (मायारहित)! आपके अनेकों (अनंत) नाम हैं और कोई नाम नहीं है (अर्थात्‌ आप सब नामों के परे हैं)॥3॥
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय।
बससि सदा हम कहुँ परिपालय
द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय।
हृदि बसि राम काम मद गंजय॥4॥
आप सर्वरूप हैं, सब में व्याप्त हैं और सबके हृदय रूपी घर में सदा निवास करते हैं, (अतः) आप हमारा परिपालन कीजिए। (राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि) द्वंद्व, विपत्ति और जन्म-मत्यु के जाल को काट दीजिए। हे रामजी! आप हमारे हृदय में बसकर काम और मद का नाश कर दीजिए॥4॥
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥34॥
आप परमानंद स्वरूप, कृपा के धाम और मन की कामनाओं को परिपूर्ण करने वाले हैं। हे श्री रामजी! हमको अपनी अविचल प्रेमाभक्ति दीजिए॥34॥

- हे भगवन्‌! आपकी जय हो। आप अंतरहित, विकाररहित, पापरहित, अनेक (सब रूपों में प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं॥1॥




गीता सार

                   

 गीता सार


भगवान श्रीकृष्ण प्रत्येक इंसान से विभिन्न विषयों पर प्रश्न करते हैं और उन्हें माया रूपी संसार को मन से त्यागने को कहते हैं, भगवान का कहना है कि पूरी जिंदगी सुख पाने का एक और केवल एक ही रास्ता है और वह है उनके प्रति पूरा समर्पण।

तुम क्यों व्यर्थ चिंता करते हो? तुम क्यों भयभीत होते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा का न कभी जन्म होता है और न ही यह कभी मरता है।

परिवर्तन संसार का नियम है, एक पल में आप करोड़ों के स्वामी हो जाते हो और दूसरे पल ही आपको ऐसा लगता है कि आपके पास कुछ भी नहीं है।

अपने आप को भगवान के हवाले कर दो, यही सर्वोत्तम सहारा है, जिसने इस शस्त्र-हीन सहारे को पहचान लिया है वह भय, चिंता और दु:खों से मुक्त हो जाता है।

जो कुछ भी आज तुम्हारा है, कल किसी और का था और परसों किसी और का हो जाएगा, इसलिए माया के चकाचौंध में मत पड़ो। माया ही सारे दु:ख, दर्द का मूल कारण है।

न तो यह शरीर तुम्हारा है और न ही तुम इस शरीर के हो, यह शरीर पांच तत्वों (अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश) से बना है और एक दिन यह शरीर इन्हीं में विलीन हो जाएगा।

जो हुआ वह अच्छा ही हुआ है, जो हो रहा है वह अच्छा ही हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा। बीते समय के लिए पश्चाताप मत करो, आने वाले समय के लिए चिंता मत करो, जो समय चल रहा है केवल उसी पर ध्यान केन्द्रित करो।

तुम्हारा अपना क्या है, जिसे तुम खो दोगे? तुम क्या साथ लाए थे जिसका तुम्हें खोने का डर है? तुमने क्या जन्म दिया जिसके विनाश का डर तुम्हें सता रहा है? तुम अपने साथ कुछ भी नहीं लाए थे। हर कोई खाली हाथ ही आया है और मरने के बाद खाली हाथ ही जाएगा।



॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥

Sunday, 1 April 2018

कृष्णभक्त कवि रसखान

रसखान का जन्म सन् 1548 में हुआ माना जाता है। उनका मूल नाम सैयद इब्राहिम था और वे दिल्ली के आस-पास के रहने वाले थे। कृष्ण-भक्ति ने उन्हें ऐसा मुग्ध कर दिया कि गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा ली और ब्रजभूमि में जा बसे। सन् 1628 के लगभग उनकी मृत्यु हुई।
सुजान रसखान और प्रेमवाटिका उनकी उपलब्ध कृतियाँ हैं। रसखान रचनावली के नाम से उनकी रचनाओं का संग्रह मिलता है।
प्रमुख कृष्णभक्त कवि रसखान की अनुरक्ति न केवल कृष्ण के प्रति प्रकट हुई है बल्कि कृष्ण-भूमि के प्रति भी उनका अनन्य अनुराग व्यक्त हुआ है। उनके काव्य में कृष्ण की रूप-माधुरी, ब्रज-महिमा, राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का मनोहर वर्णन मिलता है। वे अपनी प्रेम की तन्मयता, भाव-विह्नलता और आसक्ति के उल्लास के लिए जितने प्रसिद्ध हैं उतने ही अपनी भाषा की मार्मिकता, शब्द-चयन तथा व्यंजक शैली के लिए। उनके यहाँ ब्रजभाषा का अत्यंत सरस और मनोरम प्रयोग मिलता है, जिसमें ज़रा भी शब्दाडंबर नहीं है।
रसखान के दोहे / पदावलियाँ

१। मोरपखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।

ओढ़ि पिताम्बर लै लकुटी, बन गोधन ग्वालन संग फिरौंगी।।

भावतो तोहिं जो है रसखान, तो तोरे कहे सब स्वाँग भरौंगी।

पै वा मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरा न धरौंगी।।


(गोपी कहती है) सिर के ऊपर मोरपंख रखूँगी, गुंजों (गुंजा या घुमचिल लाल और काले रंग का एक बहुत छोटा पत्थर है जिसका वज़न एक रत्ती माना जाता है) की माला गले में पहिनूँगी। पीताम्बर ओढ़ कर वन में गायों और ग्वालों के संग वन में भ्रमण करूँगी। रसखान कहते हैं क्योंकि तुझे (कृष्ण) को अच्छा लगता है इस लिये यह सारा तमाशा तेरे लिये करूँगी किन्तु तुम्हारे अधरों पर रखी हुई यह मुरली मैं अपने अधरों पर नहीं रखूँगी।


२। या लकुटी अरु कामरिया पै, राज्य तिहूँ पुर को तजि डारौं।

आठहुँ सिद्धि नवो निधि को सुख, नंद की गाय चराय बिसारौं।।

रसखान कबहुँ इन आँखिन सों ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।

कोटिन हूँ कलधौत के धाम करील के कुंजन वा पर वारौं।।


(रसखान कहते हैं) इस लकुटी (छड़ी) और कम्बल पर तीनों लोकों का राज्य छोड़ सकता हूँ। आठों सिद्धियों और नवों निधियों का सुख नन्द की गायें चरा कर भुला सकता हूँ। रसखान कहते हैं कि क्या मैं कभी इन आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाबों को देख सकूँगा? सोने के बने करोड़ों महल वृन्दावन के करील के कुंजों पर न्योछावर कर सकता हूँ।


३। धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।

खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।

वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी

काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।


(बाल) कृष्ण धूल से भरे अति शोभित हो रहे हैं, सिर पर सुन्दर चोटी है, खेलते, खाते आँगन में घूम रहे हैं, पैरों में पैंजनी और कमर में पीली कछौटी बँधी है। रसखान कहते हैं कि उस छवि पर कामदेव अपनी करोड़ों कलाओं को न्योछावर करते हैं। अहोभाग्य उस कौवे के जो कृष्ण के हाथ से माखन रोटी छीन कर ले गया।


४। मानुष हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।

जो पशु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन।।

पाहन हौं तो वही गिरि को, जो लियो कर छत्र पुरन्दर कारन।

जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिन्दि कूल कदम्ब की डारन।।


रसखान कहते हैं कि (अगले जन्म में) मैं यदि मनुष्य हूँ तो मैं गोकुल के ग्वालों और गायों के बीच रहना चाहूँगा। यदि मैं बेबस पशु हूँ तो मै नन्द की गायों के साथ चरना चाहूँगा। अगर मैं पत्थर हूँ तो उसी पहाड़ का जिसे कृष्ण ने इन्द्र के कारण अपनी उँगली पर उठाया था। यदि मैं पक्षी हूँ तो मैं यमुना के तट पर किसी कदम्ब वृक्ष पर बसेरा करूँ।


५। गावैं गुनी गनिका गन्धर्व औ सारद सेस सबै गुण गावैं।

नाम अनन्त गनन्त गनेस जो ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावैं।।

जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहिं समाधि लगावैं।

ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।


जिसके गुण अप्सरायें, गन्धर्व, शारदा और शेष सभी गाते हैं, जिसके अगणित नामों को गणेश भी नहीं गिन सकते, ब्रह्मा और त्रिलोचन शिव जी जिसकी महिमा का पार नहीं पाते हैं, योगी, यती, तपस्वी और सिद्ध जिसको पाने के लिये समाधि लगाते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।


६। सेस गनेस, महेस, दिनेस, सुरेसहु जाहिं निरन्तर गावैं।

जाहिं अनादि, अनन्त अखंड, अछेद, अभेद सुबेद बतावैं।

नारद से सुक व्यास रटैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।

ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।


शेष, महेश, गणेश, दिनेश (सूर्य) और सुरेश (इन्द्र) जिसके गुण निरन्तर गाते हैं, जिसे वेद अनादि, अनन्त, अखंड, अछेद्य, और अभेद बतातेहैं, नारद, शुकदेव और व्यास जैसे मुनि जिसका नाम रटते हैं और प्रयत्न करके भी उसका पार नहीं पाते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।


७। संकर से सुर जाहिं जपैं चतुरानन ध्यानन धर्म बढ़ावैं।

नेक हिये में जो आवत ही जड़ मूढ़ महा रसखान कहावै।।

जा पर देव अदेव भुअंगन वारत प्रानन प्रानन पावैं।

ताहिं अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पे नाच नचावैं।।


शंकर जी जैसे देव जिसे जपते हैं और ब्रह्मा जी धर्म की वृद्धि के लिये जिसका ध्यान करते हैं, जिसके बस तनिक ही हृदय में आ जाने पर मेरा जैसा जड़, मूढ़ रसखान (रस की खान) कहलाता है, जिस पर देवता, राक्षस, नाग अपने प्राणों को न्योछावर करते हैं, उसी (कृष्ण) को अहीरों की कन्यायें कटोरे भर मट्ठे के लिये नाच नचाती हैं।

*Jai Jai Girivar Raj Kishori.जय जय गिरिवर राज किशोरी ( सीता जी द्वारा पार्वती जी की स्तुति )*

Jai Jai Girivar Raj Kishori.जय जय गिरिवर राज किशोरी ( सीता जी द्वारा पार्वती जी की स्तुति )



जय -जय गिरिवर राज किशोरी । जय महेश मुख चन्द चकोरी।।
जय गजबदन षडाननमाता ।जगत जननी दामिनी दुति गाता।।

नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।।
भव भव विभव पराभव कारिनि। विश्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।

पति देवता सुतीय महुँ    मातु प्रथम  तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि   सहस्  सारदा सेष।।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी।बरदायनी पुरारी पिआरी।।
 देबि पूजि पद कमल तुम्हारे ।सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।

मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहीं के ।।
कीन्हेऊँ प्रगट न कारन तेहीं।अस कहि चरन गहे बैदेही ।।

बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसकानी ।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ।।

सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहिं मनकामना तुम्हारी ।।
नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरू मिलिहि जाहिं मनु राचा ।।

मनु जाहिं  राचेउ मिलिहि सो बरू सहज सुंदर साँवरो ।
    करुना निधान सुजान सीलु सनेह जानत रावरो ।।

एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली ।
  तुलसी भवानिहि पूजि पुनि  पुनि मुदित मन मंदिर चली ।।

  सोरठा -जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाय कहि ।
             मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।। 

करुना करो गुरु देव

करुना करो गुरु देव रहमत करो गुरु देव,
अब तो आ भी जाओ जल्दी आ भी जाओ,
एसे ना रुलाओ जल्दी आ भी जाओ,
दर्श को तरसे ये नैना कटे न दिन कटे न रैना,  

देर ना लगाओ अब तो आ भी जाओ........

तेरे सिवा मेरा कोई नही ,
तुझसे ही मेरी ज़िन्दगी,तेरा सुमिरन साधना यही, 
तुम से शोरत है हमारी, तुम ही दोलत हो हमारी,
तुम से रोशन चाँद सितारे  , हर ख़ुशी हर एक नज़ारे , 
अब तो आ भी जाओ जल्दी आ भी जाओ......

हम को बस तेरी ही जरुरत ,दिल में ख्वाहिस  है तेरी,
दरस  बिन तेरे गुरुवर भीगी है अखियाँ मेरी,
सूना  लगता ये जहां है ,फीका लगता हर समां है ,यु न तडपाओ,
अब तो आ भी जाओ जल्दी आ भी जाओ......

यूं तो है जग में हजारो पर कोई तुमसा नही,
तेरे दर पे जो है मिलता वो नही मिलता कहीं ,
तेरे कदमो में है जन्नत ,हमको है बस तेरी चाहत,
पास हरदम तुम रहो ,दिल ने मांगी है ये मन्नत, मान भी जाओ,
अब तो आ भी जाओ जल्दी आ भी जाओ......

Sabse Bada Punya -सबसे बड़ा पुण्य !

एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था . यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था. 
एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा- “ महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”
देव बोले- “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं.”
यह सुनकर राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”
देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया.
राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है.”
उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए.
कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी.
राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”
देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं !”
राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग ? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे !! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है ? ”
देव महाराज ने बहीखाता खोला , और ये क्या , पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।
राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- “महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ ?
देव ने कहा- “राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं. जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है. ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है. परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं.
देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे..”
अर्थात ‘कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे.’ राजन! भगवान दीनदयालु हैं. उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है..”
राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं।
मित्रों, जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- “परोपकाराय पुण्याय भवति” अर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है. और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे .
धन्यवाद !